मैं एक प्रतिष्ठित दैनिक में काम करता हूँ। काम क्या करता हूँ, ख़बरों की लाशों को कालमों के ताबूत में दफ़न कर के उन पर हेड लाइंस की पट्टियाँ ठोंक देता हूँ। कफ़न के हिसाब से लाशों को कांट-छांट देता हूँ।
आरुषि... आरुषि... आरुषि। दो महीने हो गए, इस लड़की की ख़बर और उसकी लाश की फोटो आज भी सेलेबल है। पन्ना हो या स्क्रीन। लेकिन अभी परसों शाम बड़ा झटका लगा मुझे। नेट पर एक तस्वीर आरुषि के मर्डर से जुड़ी दिखाई दी। 'एक्सक्लूसिव' तस्वीर। खून के छींटे, बिखरे बाल, बेजान हाथ... दोबारा उधर नज़र नहीं गई।
मेरे एक अज़ीज़ सहकर्मी की निगाह उस पर पड़ी तो वे व्याकुल हो उठे। आप ग़लत समझे... । शब्दों को फ़िर से पढ़िये। उन्हें यह तस्वीर चाहिए थी। वह उसका प्रिंट लेना चाहते थे। मैंने उनके चेहरे की तरफ़ देखा, उनकी आंखों में ऐसी विद्रूप चमक थी, जिसे समझ कर भी मैं समझना नही चाहता था। उन्हें बेजान शरीर और खून के धब्बे नहीं लाश का उघड़ा हुआ शरीर नज़र आ रहा था। मैंने अपने चारों ओर देखा तो लगा हम सभी के आस्तीनों पर आरुषि का खून है।
सच मानिये बड़ी तसल्ली हुई की आरुषि मर गई। मन ने कहा काश अपना शरीर भी साथ ले जाती। ... अगर जिंदा रहती तो हम भेडियों की भीड़ से कब तक बचती आरुषि? इसी तरह गोवा बीच पर पाई गई स्कारलेट कीलिंग की लाश भी लोगों को खुश करती रही।
हम खबरें बनाते हैं, पढ़ते हैं, स्क्रीन पर बहस करते हैं, हत्यारों, दरिंदों को पकड़ने की बात करते हैं। लेकिन... डेस्क से उठते ही, कैमरा ऑफ़ होते ही दरिंदों की इसी भीड़ में शामिल हो जाते हैं। रोज चिंता जताई जाती है। स्त्री-पुरूष अनुपात बिगड़ रहा है। सच है, औरत, हम नहीं चाहते तुम मरो, तुम्हे मरने का कोई हक़ नहीं है। तुम्हे तो यातना शरीर मिलना चाहिए ताकि तुम अनंतकाल तक जियो, और तुम्हें रौंद कर हम खुश होते रहें।
मन कहता है, अगर यह संतुलन बिगड़ रहा है तो कम से कम हैवानों की बढती नस्ल में कुछ कमी तो आएगी। माँ, अब तुम अवतार और पैगम्बरों को जन्म नही दे रही हो।
बस, इसीलिए राहत होती है आरुषि की तुम चली गईं, पर बेहतर होता अपना शरीर भी लेती जातीं। हम इसकी भी कद्र नहीं कर पा रहे हैं।
Saturday, 5 July 2008
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